
नई दिल्ली 14 मार्च। केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी ने लोकसभा में वक्तव्य देकर देश को आश्वस्त करने की कोशिश की कि कच्चा तेल, पेट्रोल-डीजल, गैस, मिट्टी का तेल और विमानन टरबाइन ईंधन की कोई कमी नहीं है। तेल के पर्याप्त भंडार हैं। हम 40 देशों से कच्चा तेल मंगवा रहे हैं। घरेलू गैस एलपीजी पर दहशत और घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि गैस सिलेंडर की आपूर्ति औसतन अढाई दिन में सुनिश्चित करने के आदेश हैं। सीएनजी की सप्लाई 100 फीसदी है और एलएनजी कार्गाे हररोज आ रहे हैं। एलपीजी का उत्पादन 28 फीसदी बढ़ा दिया गया है। मंत्री ने जमाखोरी, कालाबाजारी का भी जिक्र किया। इससे कौन निपटेगा? गैस एजेंसियों के कर्मचारी ही सरेआम घरेलू गैस का सिलेंडर 2500-3000 रुपए में बेच रहे हैं। क्या उन पर अंकुश लगाया जा सकता है? मंत्री ने यह भी कहा कि यह ‘फेक नेरेटिव’ फैलाने का समय नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी लगभग यही बात कही है, लेकिन वह चुनावी सभाओं में बोल रहे हैं। प्रधानमंत्री या तो देश को संबोधित करें अथवा संसद में आकर बोलें, चुनावी रैलियों की बात पर जनता भरोसा नहीं करती। चूंकि मंत्री ने संसद में बयान दिया है, लिहाजा देश को विश्वास करना चाहिए, लेकिन आंखें जो यथार्थ देख रही हैं, वह क्या है? सडक़ों पर लोग बिछने लगे हैं। पेट्रोल पंपों पर भीड़ उमड़ी है और गैस एजेंसियों के बाहर लंबी-लंबी कतारें लगी हैं। रसोई गैस गायब है और अनिश्चित है कि सिलेंडर कब मिलेगा? घर की रसोई में खाना बनेगा अथवा नहीं! तेल कंपनियों ने एलपीजी सिलेंडर को 60 रुपए और कमर्शियल सिलेंडर को 114.5 रुपए महंगा क्यों किया? युद्धकाल में ही महंगा क्यों किया गया? इससे भी संवेदनशील सच यह है कि अयोध्या में ‘राम रसोई’ को बंद करना पड़ा है, जहां औसतन 20,000 से 30,000 लोग रोजाना मुफ्त खाना खाते थे। हालांकि विकल्प तलाशे जा रहे हैं। मुंबई के ‘सिद्धिविनायक मंदिर’ में इंडक्शन चूल्हे पर प्रसाद आदि बनाया जा रहा है। बेंगलुरु के ‘बनशंकरी मंदिर’ में प्रसाद बंद करना पड़ा है। दिल्ली उच्च न्यायालय की रसोई बंद कर दी गई है।
कुछ पैकबंद और फ्रूट चाट आदि परोसे जा रहे हैं। ‘शताब्दी एक्सप्रेस’ ट्रेन के कुछ रूट पर गरम, ताजा खाना नहीं मिला, बल्कि पैकबंद खाना परोसा गया। छोटे ढाबे या तो बंदी के कगार पर हैं अथवा उन्होंने एक-दो भोजन बनाने तक ही सीमित कर लिया है। वे डीजल की भ-ी जला रहे हैं। घोर प्रदूषण३! मुंबई के 50 फीसदी होटल, रेस्तरां भी तालाबंदी की सोच रहे हैं। तमिलनाडु में यह आंकड़ा करीब 10,000 है। अर्थव्यवस्था को झटके लग रहे हैं और रोजगार भी छिन रहा है। इनकी भरपाई कैसे होगी? दरअसल यह भारत का औसतन ऊर्जा-सच है। कई उदाहरण सामने आ रहे हैं, क्योंकि कमर्शियल गैस भी उपलब्ध नहीं है। भारत 60-66 फीसदी गैस आयात करता है। अब हम 22 लाख टन गैस अमरीका से आयात करेंगे, लेकिन वह गैस 45 दिन के बाद भारत पहुंचेगी। खाड़ी देशों ने युद्ध के कारण आपूर्ति रोक दी है, उत्पादन भी बहुत कम कर दिया है। ईरान ने होर्मुज जलमार्ग को बिल्कुल बंद कर दिया है। पानी के नीचे बारूदी सुरंगें बिछा दी हैं। ईरानी सैनिक तेल के जहाजों पर हमले कर उन्हें भस्म कर रहे हैं। दिलचस्प तथ्य सामने आया है कि हम मात्र पौने दो दिन की गैस का ही भंडारण कर सकते हैं। उसके लिए विशाखापट्टनम और मंगलुरु में ही मात्र दो भूमिगत भंडारण की गुफाएं हैं। देश की आबदी 147 करोड़ से अधिक और गैस भंडारण की मात्र दो गुफाएं३! कितने पराश्रित और अधूरे हैं हम! पेट्रोलियम मंत्री ने यह भी आश्वस्त किया है कि रिफाइनरियां पूरी क्षमता के साथ काम कर रही हैं, लिहाजा 50 लाख एलपीजी सिलेंडर की रोजाना आपूर्ति की जा रही है। होटल, रेस्तरां वालों को वैकल्पिक ईंधन इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है। उससे कार्बन उत्सर्जन बढ़ेगा और प्रदूषण भी अधिक होगा, भारत उसका क्या जवाब देगा? भारत ‘पेरिस संधि’ का एक सदस्य है और उसे तय समय-सीमा में उत्सर्जन कम करना है। बहरहाल मंत्री कुछ भी कहें, लेकिन भारत में ऊर्जा-संकट साक्षात दिखाई दे रहा है। जगह-जगह लोग खाली सिलेंडरों के साथ घरों को लौट रहे हैं और गैस एजेंसियों के आगे लोगों की लंबी-लंबी कतारें दिख रही हैं। शहरी क्षेत्रों में समस्याएं ज्यादा आ रही हैं।


