उत्तराखंडधर्म/संस्कृति

नैनीताल में मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं का निर्माण शुरू

आस्था के साथ प्रकृति संरक्षण का संदेश देता है मां नंदा-सुनंदा देवी महोत्सव

ब्रह्म मुहूर्त में होगी मां नंदा-सुनंदा की प्राण प्रतिष्ठा, विधि-विधान से होगी पूजा-अर्चना

नैनीताल 18 सितम्बर। सरोवर नगरी नैनीताल समेत पूरे कुमाऊं मंडल में इन दिनों मां नंदा-सुनंदा के जयकारों से वातावरण भक्तिमय बना हुआ है। श्रद्धालु मां के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए उमड़ रहे हैं। इसी क्रम में मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं का निर्माण कार्य पारंपरिक विधि से किया जा रहा है। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में मां नंदा-सुनंदा की प्राण प्रतिष्ठा के साथ विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाएगी।
सामाजिक कार्यकर्ता एवं छात्र हर्षित जोशी ने एक भेंटवार्ता में बताया कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और धार्मिक परंपराओं में मां नंदा का विशेष स्थान है। कुमाऊं के लोग मां नंदा को अपनी आराध्य देवी के रूप में पूजते हैं। उन्हें हिमालय की पुत्री और माता पार्वती का स्वरूप माना जाता है। नैनीताल में आयोजित होने वाला श्री नंदा-सुनंदा देवी महोत्सव इसी आस्था, लोकपरंपरा और सामुदायिक सहभागिता का प्रमुख पर्व है।
उन्होंने बताया कि नैनीताल में नंदा देवी महोत्सव की शुरुआत वर्ष 1903 में हुई थी, जबकि वर्ष 1926 से श्रीराम सेवक सभा द्वारा महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। समय के साथ यह आयोजन नैनीताल की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा बन गया है।
सामुदायिक सहभागिता की रही है परंपरा
श्री जोशी के अनुसार, 1980 के दशक से पहले तक मां नंदा-सुनंदा का डोला भ्रमण कराने में नेपाली श्रमिकों का भी सहयोग लिया जाता था। यह परंपरा महोत्सव के सामुदायिक स्वरूप और विभिन्न वर्गों की सहभागिता को दर्शाती है।
कदली वृक्ष से तैयार होती हैं मां की प्रतिमाएं
नंदा देवी महोत्सव की सबसे विशिष्ट परंपराओं में कदली वृक्ष से मां नंदा-सुनंदा की प्रतिमाओं का निर्माण शामिल है। कदली यानी केले का पौधा भारतीय परंपरा में पवित्र माना जाता है। महोत्सव में कदली वृक्ष का धार्मिक महत्व होने के साथ-साथ प्राकृतिक महत्व भी सामने आता है।
प्राकृतिक सामग्री से प्रतिमा निर्माण की यह परंपरा पहाड़ की संस्कृति और प्रकृति के गहरे संबंध को दर्शाती है। कदली के तने के साथ हरे बांस, कपास और कपड़े जैसी सामग्री का प्रयोग कर पारंपरिक कलाकार प्रतिमाओं को आकार देते हैं। इससे स्थानीय लोककला और पारंपरिक ज्ञान को भी संरक्षण मिलता है।
मां नंदा की आस्था से जुड़ा है हिमालय और प्रकृति संरक्षण
मां नंदा को हिमालय की पुत्री माना जाता है। यही कारण है कि उनकी आराधना को हिमालय और उसकी प्रकृति के प्रति सम्मान से भी जोड़कर देखा जाता है। हिमालय के जंगल, बुग्याल, नदियां, जलस्रोत और जैव विविधता पहाड़ के सामाजिक एवं आर्थिक जीवन का महत्वपूर्ण आधार हैं।
महोत्सव में प्राकृतिक सामग्री के प्रयोग, पौधारोपण और प्लास्टिक से दूरी जैसे संदेश पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। वहीं पारंपरिक प्रसाद में स्थानीय अनाज का प्रयोग पहाड़ की कृषि और स्थानीय जीवन-पद्धति से पर्व के संबंध को भी दर्शाता है।
जलवायु परिवर्तन के दौर में संरक्षण का संदेश
वर्तमान दौर में ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन हिमालयी क्षेत्रों के सामने गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियां पैदा कर रहे हैं। ऐसे समय में नंदा-सुनंदा महोत्सव धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन के साथ-साथ प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का संदेश देने का माध्यम भी बन सकता है।
हर्षित जोशी ने कहा कि मां नंदा के प्रति उत्तराखंडवासियों की अगाध श्रद्धा में पहाड़ के प्राकृतिक संसाधनों, जंगलों, बुग्यालों और जैव विविधता के प्रति प्रेम एवं संरक्षण की भावना भी निहित है। नैनीताल का नंदा-सुनंदा देवी महोत्सव आस्था, लोकसंस्कृति और प्रकृति संरक्षण को एक साथ जोड़ने वाली ऐसी परंपरा है, जिसमें अतीत की विरासत के साथ वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश छिपा है।रिपोर्ट : ललित जोशी।

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