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सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने वाले विधेयक का डॉ. नरेश बंसल ने किया जोरदार समर्थन

नई दिल्ली 05 अगस्त । भाजपा के राष्ट्रीय सहकोषाध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद डॉ. नरेश बंसल ने सदन में ‘सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या संशोधन विधेयक, 2026’ पर चर्चा में भाग लेते हुए विधेयक का जोरदार समर्थन किया। उन्होंने कहा कि यह केवल चार न्यायिक पद बढ़ाने का विधेयक नहीं, बल्कि देश में न्याय प्रदान करने की संस्थागत क्षमता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
डॉ. बंसल ने कहा कि लोकतंत्र में सरकार सदन के प्रति उत्तरदायी होती है। जब सदन का सत्र नहीं चल रहा होता और तत्काल कानून की आवश्यकता होती है, तब सरकार अध्यादेश के माध्यम से व्यवस्था करती है और सत्र शुरू होने पर उसे सदन के समक्ष रखकर चर्चा एवं पारित कराने की प्रक्रिया पूरी करती है। उन्होंने कहा कि वर्तमान विधेयक भी सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीशों की संख्या संशोधन अध्यादेश, 2026 का स्थान लेगा।
उन्होंने बताया कि विधेयक के पारित होने के बाद सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 33 से बढ़कर 37 हो जाएगी और मुख्य न्यायाधीश सहित कुल संख्या 38 होगी। इसके लिए आवश्यक प्रशासनिक ढांचे एवं वित्तीय प्रावधानों का भी विधेयक में उल्लेख किया गया है।
डॉ. बंसल ने कहा कि “न्याय केवल संविधान का शब्द नहीं, बल्कि हर नागरिक का अधिकार है।” न्याय में देरी होने पर केवल मुकदमा लंबित नहीं रहता, बल्कि नागरिक का न्याय व्यवस्था के प्रति विश्वास भी प्रभावित होता है। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान में 95 हजार से अधिक मामले लंबित हैं। वर्ष 2025 में ही 75,410 नए मामले आए, जबकि 65,615 मामलों का निस्तारण हुआ। ऐसे में दाखिल होने वाले मामलों की संख्या निस्तारित मामलों से अधिक होने के कारण न्यायिक व्यवस्था की क्षमता बढ़ाना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि विधेयक का उद्देश्य केवल न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि त्वरित न्याय की संवैधानिक भावना को प्रभावी बनाना है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को त्वरित न्याय उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि न्यायपालिका जितनी मजबूत होगी, संविधान उतना ही मजबूत होगा और संविधान की मजबूती से नागरिकों की सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी।
डॉ. बंसल ने “धर्मो रक्षति रक्षितः” का उल्लेख करते हुए कहा कि जो न्याय की रक्षा करता है, न्याय उसकी रक्षा करता है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका की मजबूती लोकतंत्र की मजबूती का आधार है।
राज्यसभा सांसद ने लंबित जनहित याचिकाओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि लगभग 3,525 जनहित याचिकाएं लंबित हैं, जिनमें करीब 698 एक दशक से अधिक पुरानी हैं। उन्होंने कहा कि सबसे पुरानी जनहित याचिका वर्ष 1984 की बताई गई है। यदि न्याय की तलाश में उठाया गया सवाल दशकों तक जवाब की प्रतीक्षा करता रहे, तो न्याय व्यवस्था की क्षमता पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि विधेयक का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य संविधान पीठों का नियमित और निरंतर गठन आसान बनाना भी है, ताकि संवैधानिक महत्व के मामलों की सुनवाई नियमित अपीलीय कार्यवाही को प्रभावित किए बिना प्रभावी ढंग से हो सके। संविधान से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों का समाधान वर्षों तक लंबित नहीं रहना चाहिए और संविधान की व्याख्या जितनी स्पष्ट एवं समयबद्ध होगी, लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा।
डॉ. बंसल ने न्याय तक पहुंच को आसान बनाने के लिए टेली-लॉ के माध्यम से 776 जिलों और ढाई लाख ग्राम पंचायतों तक पहुंच तथा 1.12 करोड़ से अधिक मामलों में पूर्व-विधिक परामर्श का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि न्याय का रास्ता किसी नागरिक की आर्थिक स्थिति, जेब या भौगोलिक दूरी से तय नहीं होना चाहिए।
अंत में डॉ. बंसल ने कहा कि न्याय की राह में कोई दीवार नहीं होनी चाहिए और आम नागरिक के मन में व्यवस्था के प्रति लाचारी का भाव नहीं आना चाहिए। संविधान का सम्मान तभी वास्तविक रूप से साकार होगा, जब प्रत्येक नागरिक को समय पर न्याय मिल सके।

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