संवाददाता:ललित जोशी
नैनीताल 07 नवम्बर ।
सरोवर नगरी नैनीताल के पूर्व विधायक एवं उत्तराखंड क्रांति दल के वरिष्ठ नेता डॉ. नारायण सिंह जंतवाल के आकस्मिक निधन से पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई है। उन्होंने नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में अंतिम सांस ली। 66 वर्षीय डॉ. जंतवाल का निधन हृदयाघात के कारण हुआ। उनके निधन का समाचार मिलते ही नैनीताल में शोक की लहर फैल गई। उनके आवास पर शोक संवेदना व्यक्त करने वालों का तांता लग गया। राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षणिक एवं विभिन्न संगठनों से जुड़े लोगों ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया है।
डॉ. नारायण सिंह जंतवाल का निधन उत्तराखंड की राजनीति और राज्य आंदोलन से जुड़े लोगों के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है। वह ऐसे जननेता थे, जो आम आदमी के अधिकारों और न्याय की लड़ाई में हमेशा मजबूती से खड़े दिखाई देते थे। किसी भी जनआंदोलन या जनहित के सवाल पर वह अपनी आवाज बुलंद करने से पीछे नहीं हटते थे। उनकी स्पष्टवादिता, सादगी, गंभीरता और राजनीतिक शुचिता उनकी पहचान रही। अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना और आमजन के हितों की पैरवी करना उनके राजनीतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई और राज्य गठन के बाद भी प्रदेश के मुद्दों, अधिकारों एवं क्षेत्रीय हितों की पैरवी लगातार करते रहे। उत्तराखंड क्रांति दल के संस्थापक सदस्यों में शामिल डॉ. जंतवाल पार्टी के पूर्व केंद्रीय अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने संगठन को मजबूत बनाने और उत्तराखंड की मूल अवधारणा से जुड़े सवालों को राजनीतिक मंचों पर उठाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
डॉ. जंतवाल का राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन छात्र राजनीति से शुरू हुआ था। वह कुमाऊं विश्वविद्यालय के डीएसबी परिसर में छात्रसंघ अध्यक्ष भी रहे। वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य गठन के बाद वर्ष 2002 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में उन्होंने नैनीताल विधानसभा सीट से जीत दर्ज कर विधायक बनने का गौरव हासिल किया। विधायक के रूप में भी उन्होंने क्षेत्र की समस्याओं और जनता से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया।
बीते कुछ समय से स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के चलते उनकी राजनीतिक सक्रियता में कुछ कमी जरूर आई थी, लेकिन उत्तराखंड के मुद्दों और उत्तराखंड क्रांति दल को मजबूती प्रदान करने के प्रति उनका समर्पण अंतिम समय तक बना रहा। वह शांत, धैर्यवान, गंभीर और नैतिक मूल्यों को महत्व देने वाले राजनेता के रूप में पहचाने जाते थे। उनका जीवन राजनीतिक शुचिता और जनसेवा के प्रति प्रतिबद्धता का उदाहरण रहा।
डॉ. नारायण सिंह जंतवाल अपने पीछे पत्नी डॉ. सावित्री कैड़ा जंतवाल, जो कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल के इतिहास विभाग में प्रोफेसर हैं, तथा दो बेटियों को छोड़ गए हैं।
उनके निधन पर उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों, विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों, व्यापार मंडल, श्री राम सेवक सभा, नव सांस्कृतिक सत्संग समिति शेर का डांडा, आदर्श सूखाताल रामलीला समिति, तल्लीताल रामलीला समिति सहित अनेक सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठनों ने गहरा शोक व्यक्त किया है।
कुमाऊं विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (कूटा) की ओर से भी डॉ. जंतवाल के निधन पर गहरी संवेदना व्यक्त की गई। शोक व्यक्त करने वालों में डॉ. ललित तिवारी, डॉ. नीलू, डॉ. दीपक, डॉ. युगल, डॉ. संतोष, डॉ. कुबेर गिनती, डॉ. अनिल बिष्ट, डॉ. दीपिका गोस्वामी, डॉ. अशोक कुमार सहित एलुमनी सेल के डॉ. बीएस कालाकोटी, डॉ. एसएस सामंत, डॉ. जीसी जोशी, ज्योति कांडपाल, डॉ. मीना पांडे और डॉ. भुवन आर्य शामिल रहे।
डॉ. जंतवाल के निधन से नैनीताल ने एक ऐसा जनप्रतिनिधि और संघर्षशील आवाज खो दी है, जो सत्ता और राजनीति से परे आमजन के सवालों को प्राथमिकता देता था। राज्य आंदोलन की भावना, जनहित के प्रति प्रतिबद्धता और न्याय के पक्ष में उनकी बुलंद आवाज अब हमेशा के लिए खामोश हो गई है। उनकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी।

