पिछले दशक में, भारत के अवसंरचना परिदृश्य में एक संरचनात्मक बदलाव हुआ है—ऐसा बदलाव, जो केवल परिसंपत्ति निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशासन और सेवा अदायगी की संरचना तक विस्तारित है। पिछले चरणों की तुलना में इस दौर की विशेषता सिर्फ निवेश के पैमाने या कार्यान्वयन की गति से ही संबंधित नहीं है, बल्कि इस बात में भी है कि एक सुसंगत, परिणाम-उन्मुख प्रणाली उभर रही है, जो नीतिगत उद्देश्य, संघीय सहयोग और जमीन पर कार्यान्वयन के अनुरूप है।
आज, भारत निर्णायक रूप से एक प्लेटफॉर्म-आधारित प्रशासन मॉडल की ओर आगे बढ़ रहा है—एक ऐसा मॉडल, जो अवसंरचना को अलग-अलग परियोजनाओं के समूह के बजाय एकीकृत राष्ट्रीय प्रणाली के रूप में देखता है।
अलग-अलग परियोजनाओं के बजाय, प्रणाली की सहायता से पैमाने का विस्तार
इस बदलाव का स्पष्ट प्रमाण है – राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क का विस्तार, जो 2014 के लगभग 91,000 किमी से बढ़कर 2024 में 1.46 लाख किमी से अधिक हो गया है। निर्माण की गति में हुई वृद्धि का भी समान महत्व है, जो लगभग 12 किमी प्रति दिन से बढ़कर 34 किमी प्रति दिन से अधिक हो गई है।
इस गति को अक्सर एक तकनीकी उपलब्धि माना जाता है। वास्तव में, यह परियोजनाओं के विभिन्न पहलुओं का सहज रूप से समन्वय करने के बारे में है। यह एक ऐसी प्रणाली को प्रतिबिंबित करता है, जहाँ बाधाओं का पूर्वानुमान लगाया जाता है और समय पर समाधान किया जाता है।
सार्वजनिक नीति के दृष्टिकोण से, परियोजनाओं के तेजी से पूरे होने का सीधा मतलब है – सामाजिक और आर्थिक लाभों की जल्द प्राप्ति — गांव, बाजारों से जुड़ते हैं, स्वास्थ्य और शिक्षा तक आसान पहुँच की सुविधा मिलती है और आपदा राहत गतिविधि एवं राष्ट्रीय सहनीयता मजबूत होती है। यह लॉजिस्टिक लागत को कम करके औद्योगिक विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
जवाबदेही को संस्थागत रूप देना: समीक्षा से समाधान तक
इस दशक की एक प्रमुख विशेषता है – समयबद्ध जवाबदेही को संस्थागत रूप देना। प्रगति (सक्रिय शासन और समय पर कार्यान्वयन) की शुरुआत से जटिल, अंतर-मंत्रालयी परियोजनाओं के प्रबंधन को एक नयी दिशा मिली।
यहां सबसे महत्वपूर्ण नीति संकेत सांस्कृतिक है: विलंब को अब सामान्य नहीं माना जाता और जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से सौंपी जाती है। इसके परिणामस्वरूप, बड़े और तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण परियोजनाएं—जो कभी लंबे समय तक सुस्त पड़ी रहती थीं—अब पूर्वानुमान और अनुशासन के साथ प्रगति कर रही हैं।
एक अन्य महत्वपूर्ण बदलाव, अवसंरचना परियोजनाओं में सहयोगात्मक संघवाद को मजबूत करना रहा है। केंद्र और राज्यों के बीच नियमित व विभिन्न स्तरों पर संवाद ने कार्यान्वयन के माहौल को बदल दिया है, विशेष रूप से उन परियोजनाओं के लिए जो कई क्षेत्रों में फैली होती हैं। यह मॉडल संवैधानिक भूमिकाओं का सम्मान करता है और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के लिए सामंजस्य सुनिश्चित करता है। राज्य अब केंद्रीय प्रायोजित परियोजनाओं के निष्क्रिय प्राप्तकर्ता नहीं हैं, बल्कि योजना, कार्यान्वयन और परिणाम प्रबंधन में सक्रिय साझेदार हैं। इसका परिणाम है – तेज सहमति निर्माण, कम कानूनी विवाद और जमीन पर सुचारु क्रियान्वयन।
उद्योग जगत के दृष्टिकोण से, यह पूर्वानुमान क्षमता कार्यान्वयन जोखिम को कम करती है। नीतिगत दृष्टिकोण से, यह भारत की संघीय कार्यान्वयन क्षमता में विश्वास को मजबूत करती है।
विविध प्रारूपों से जुड़ी योजना: परिसंपत्तियों से नेटवर्क तक
भारत की अवसंरचना रणनीति, परिवहन संपर्क से प्रतिस्पर्धा की ओर भी विकसित हो रही है। सड़कों की योजनायें अब केवल अंतिम बिंदुओं के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक लॉजिस्टिक्स और परिवहन इकोसिस्टम के रूप में बनायी जा रही हैं।
राजमार्गों का रेलवे, बंदरगाहों, हवाई अड्डों और शहरी परिवहन के साथ एकीकरण—जिसका समर्थन राष्ट्रीय योजना रूपरेखाओं, जैसे गति शक्ति द्वारा किया जा रहा है— ने भारत की लंबे समय से मौजूद संरचनात्मक चुनौतियों में से एक: उच्च लॉजिस्टिक्स लागत, का समाधान करना शुरू कर दिया है।
नीति निर्माताओं के लिए, यह बदलाव एक महत्वपूर्ण सबक को रेखांकित करता है: अवसंरचना की दक्षता केवल परिसंपत्ति की गुणवत्ता से नहीं, बल्कि परिसंपत्तियों के बीच समन्वय से निर्धारित होती है। एकीकृत योजना पुनरावृत्ति को कम करती है, सार्वजनिक पूंजी का अधिकतम उपयोग करती है और राष्ट्रीय संपत्तियों के उपयोग में सुधार करती है।
निवेश और उद्योग जगत के लिए भरोसे का लाभ
स्पष्ट नीति, तेज निर्णय चक्र और दिखाई देने योग्य कार्यान्वयन गति ने निवेशकों की धारणाओं को बदल दिया है। भारत में अवसंरचना को एक स्थिर व दीर्घकालिक निवेश की संभावना के रूप में देखा जा रहा है, जिसे संस्थागत निरंतरता और प्रशासनिक संकल्प से समर्थन मिल रहा है।
ईपीसी उद्योग के लिए, यह वातावरण प्रौद्योगिकी, यांत्रिकीकरण, सुरक्षा प्रणालियों और कौशल विकास में बड़े निवेश करने की सुविधा देता है। यह कंपनियों को अनिश्चितता का सामना करने के बजाय आत्मविश्वास के साथ बड़े पैमाने की योजना बनाने की अनुमति देता है।
अगले चरण के लिए नीति प्राथमिकताएँ
भारत अवसंरचना विस्तार के अगले चरण में प्रवेश कर रहा है, नीतिगत ध्यान अब मात्रा के बजाय मूल्य की ओर होना चाहिए। प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल हैं:
प्रारंभिक योजना और गुणवत्ता युक्त डीपीआर पर विशेष ध्यान
जीवनचक्र आधारित परियोजना का योजना निर्माण, प्रारंभिक डिजाइन से परिचालन तक में स्थायित्व और सहनीयता शामिल करना
निर्णय समयसीमा को और कम करने के लिए डिजिटल प्रशासन और डेटा एकीकरण
तकनीक का उपयोग करके कार्यान्वयन गुणवत्ता बनाए रखने के लिए राज्य और स्थानीय स्तर पर क्षमता निर्माण
गति और वित्तीय विवेक को संतुलित करने वाली जोखिम-साझाकरण व्यवस्था
सभी जीवनचक्रों में कौशल विकास
भारत की अवसंरचना यात्रा को अब इरादे या कार्यक्षमता की कमी से रोका नहीं जा सकता है। आगे का कार्य इन प्रणालियों को और गहरा करना, संस्थागत निरंतरता की रक्षा करना, और यह सुनिश्चित करना है कि अवसंरचना समावेशी, प्रतिस्पर्धी और मजबूत विकास के लिए एक आधार के रूप में कार्य करती रहे।
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(लेखक, भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) महाराष्ट्र और राष्ट्रीय सड़क एवं राजमार्ग समिति के अध्यक्ष हैं)


