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सुर सरिता के मंच पर गूंजा उत्तराखंड की लोक संस्कृति का स्वर, गोपाल सिंघल सहित विभिन्न क्षेत्रों की विभूतियां ‘उत्कृष्ट गौरव सम्मान’ से सम्मानित

18 वर्षों से सांस्कृतिक एवं सामाजिक क्षेत्र में योगदान दे रही संस्था का भव्य आयोजन, सिद्धपीठ मां कैलादुंगी के गीत का हुआ विमोचन

देहरादून, 11 अक्टूबर। उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति, पारंपरिक संगीत और सामाजिक सरोकारों को समर्पित सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्था ‘सुर सरिता’ की ओर से रविवार को देहरादून के श्रेष्ठ वेडिंग पॉइंट, मथुरावाला रोड पर भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं ‘उत्कृष्ट गौरव सम्मान’ समारोह का आयोजन किया गया। विगत 18 वर्षों से सांस्कृतिक गतिविधियों के साथ सामाजिक कार्यों में सक्रिय संस्था के इस आयोजन में विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाली प्रतिभाओं को सम्मानित किया गया। समारोह का विशेष आकर्षण सिद्धपीठ मां कैलादुंगी के गीत का विमोचन रहा, जिसने धार्मिक आस्था और उत्तराखंड की लोक सांस्कृतिक परंपराओं को एक सूत्र में पिरोने का संदेश दिया।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में राज्य मंत्री जोत सिंह बिष्ट उपस्थित रहे, जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में धर्मपुर विधायक विनोद चमोली एवं कांग्रेस नेता ओमप्रकाश सती ‘बब्बन’ ने शिरकत की। अतिथियों ने विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने वाली विभूतियों को सम्मानित करते हुए उनके योगदान की सराहना की।
निर्भीक पत्रकारिता के लिए गोपाल सिंघल सम्मानित
समारोह में निर्भीक पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता गोपाल सिंघल तथा पत्रकार पोल खोल बहुगुणा को ‘उत्कृष्ट गौरव सम्मान’ प्रदान किया गया। वहीं, लोक कला के क्षेत्र में योगदान के लिए संतोष के. खेतवाल, रेनू बाला, बृज पंवार, प्रदीप पहाड़ी, गणेश एवं वीरेंद्र को सम्मानित किया गया। शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए गिरीश सकलानी एवं श्रीमती पूजा थापा को सम्मान प्रदान किया गया।
संस्था की ओर से विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत प्रतिभाओं को सम्मानित करने का उद्देश्य समाज में सकारात्मक योगदान देने वाले लोगों के कार्यों को पहचान दिलाना तथा अन्य लोगों को भी अपने-अपने क्षेत्र में बेहतर कार्य करने के लिए प्रेरित करना रहा।
लोक संस्कृति के संरक्षण पर दिया जोर
मुख्य अतिथि राज्य मंत्री जोत सिंह बिष्ट ने अपने संबोधन में कहा कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति और लोक संगीत प्रदेश की विशिष्ट पहचान हैं। लोकगीतों में यहां की परंपराओं, जनजीवन, आस्था और सांस्कृतिक मूल्यों की सजीव झलक दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि अपनी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित कर नई पीढ़ी तक पहुंचाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। इसके लिए सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने वाली प्रतिभाओं को सम्मानित करने की पहल की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे सम्मान समाज में रचनात्मकता, सेवा और समर्पण की भावना को प्रोत्साहित करते हैं। इससे अन्य लोगों को भी समाजहित में कार्य करने की प्रेरणा मिलती है।
विशिष्ट अतिथि धर्मपुर विधायक विनोद चमोली एवं कांग्रेस नेता ओमप्रकाश सती ‘बब्बन’ ने भी उत्तराखंड की लोक संस्कृति, पारंपरिक कलाओं और सामाजिक गतिविधियों को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखने तथा स्थानीय कलाकारों को मंच प्रदान करने में सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं का योगदान सराहनीय है।
मां कैलादुंगी के गीत का विमोचन रहा विशेष आकर्षण
समारोह के दौरान सिद्धपीठ मां कैलादुंगी के गीत का विमोचन किया गया। इस पहल के माध्यम से धार्मिक आस्था, लोक परंपराओं और सांस्कृतिक भावनाओं को संगीत के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया गया। उपस्थित लोगों ने गीत के विमोचन को धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पहल बताते हुए संस्था के प्रयासों की सराहना की।
कार्यक्रम में उत्तराखंड की लोक परंपराओं, लोकगीतों और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण एवं संवर्धन का संदेश प्रमुखता से सामने आया। वक्ताओं ने कहा कि लोक कला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि प्रदेश की ऐतिहासिक विरासत, सामाजिक जीवन और सांस्कृतिक पहचान की अभिव्यक्ति भी है। इसलिए कलाकारों को प्रोत्साहन देना और पारंपरिक कलाओं को नई पीढ़ी से जोड़ना समय की आवश्यकता है।
18 वर्षों से सांस्कृतिक और सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय है सुर सरिता
संस्था ‘सुर सरिता’ विगत 18 वर्षों से सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन के साथ सामाजिक कार्यों में भी निरंतर योगदान दे रही है। संस्था का उद्देश्य लोक संस्कृति एवं परंपराओं का संरक्षण, कलाकारों को प्रोत्साहन, सांस्कृतिक गतिविधियों का विस्तार तथा समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाली प्रतिभाओं को सम्मानित करना है।
समारोह में सम्मानित विभूतियों के योगदान को सराहा गया और उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने तथा सामाजिक दायित्वों के प्रति समर्पित रहकर कार्य करने का संदेश दिया गया। कार्यक्रम का समापन लोक संस्कृति के संरक्षण, सामाजिक सहभागिता और प्रदेश की गौरवशाली परंपराओं को आगे बढ़ाने के संकल्प के साथ हुआ।

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